पढ़िए गोल्डन परी हिमा दास के जीवन के बारे में।

फ़िनलैंड में चल रहे एथलेटिक्स गैम में अपनी रेसिंग से सिर्फ 20दिन में 6 स्वर्ण पदक जीतने वाली हिमा दास के आज लोगों के मुंह से उसके किस्से सुनने को मिल रहे है. असम की रहने वाली हिमा दास ने World U-20 Championships 2018, फ़िनलैंड में स्वर्ण पदक जीतकर रातोंरात सुर्ख़ियों में आ गयी थी. हिमा दास ने पिछले कुछ दिनों में शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं. सभी बहुत खुश हैं कि उन्होंने विभिन्न टूर्नामेंटों में छह पदक जीते हैं.
प्रारम्भिक जीवन

हिमा दास का जन्म 9 जनवरी 2000 को असम राज्य के नागाव जिले के ढिंग में हुआ था. हिमा एक दलित परिवार से हैं. हिमा के पिताजी का नाम रोंजित दास और माताजी का नाम जोमाली दास हैं. उनके घर में कुल 16 सदस्य हैं. घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि बस अपने खाने-पीने की व्यवस्था हो जाती थी. परिवार में हिमा और उनके माता-पिता के अलावा 5 भाई और बहन हैं. हिमा का पिता खेती बाड़ी का काम करते है. जो धान की खेती करता है.

जब हिमा गांव में रहती थी तो बाढ़ की वजह से कई-कई दिन तक प्रैक्टिस नहीं कर पाती थी क्योंकि जिस खेत या मैदान में वह दौड़ की तैयारी करती, बाढ़ में वह पानी से लबालब हो जाता था. वर्ष 2017 में हिमा राजधानी गुवाहाटी में एक कैम्प में हिस्सा लेने आई थीं तब उनपर निपुण दास की नज़र उन पर पड़ी. जिसके बाद निपुण ने ही हिमा को एथलेटिक के गुण सिखाये.

निपुण हिमा के माता पिता स मिलने गए और हिमा को गुवाहाटी लाने को कहा. माता पिता के पास हिमा के लिए खर्च करन के पैसे नहीं थे. निपुण न ही हिमा का खर्चा का बीड़ा उठाया.
हिमा को जब एडिडास की ब्रांड एंबेसडर
हिसा के पास ट्रेनिंग के लिए अच्छे जूते नहीं थे. हिमा की ट्रेनिंग अच्छी चल रही थी. हिमा के पिता जो एक किसान है और धान की खेती करता. बेटी की चाहत को देखते हुए बेटी को रेसिंग से रोकना नहीं चाहते थे. हिमा के लिए न चाहते हुए भी 1200 रूपए के अच्छे जूते खरीदें. आप खुद अंदाजा लगे सकते है कि जब पिता हिमा के लिए जूते खरीदकर ले गए होंगे हिमा कितनी खुश हो गई होगी.एडिडास फुटवियर बनाने वाली जर्मन कम्पनी ने सितंबर 2018 में हिमा को एक चिठ्ठी लिखकर इस जर्मन कम्पनी ने ब्रांड एंबेसडर बनाया था.
खेल और परिक्षा को लेकर उलझन में थी जब हिमा

2018 में कॉमनवेल्थ गेम्स ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में हुए. 4 से 15 अप्रैल के बीच गेम हुए. जिनको लेकर हिमा दास काफी दुविधा में फंस गई थी. उसको समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? एक तरफ तो परिक्षा दूसरी तरफ गेम बस इसी में हिमा का दिमाग उलझता जा रहा था. हिमा ने बड़ी मुश्किल से समझ से काम लिया और सोचा परिक्षा तो अगले साल भी हो सकती हैं लेकिन गेम निकल गया तो फिर वापिस नहीं आएगा.कॉमनवेल्थ में 400 मीटर की रेस में वे छठे स्थान पर रहीं.
फुटबाल खेलने से दौड़ की शुरूआत

हिमा दास स्कूल में लड़को के साथ फुटबाल खेला करती थी. फुटबाल खेल में दौड़ना भी होता है. हिमा दास काफी अच्छी रेसिंग कर लेती थी. हिमा को एक टीचर ने रेस की सलाह दे डाली. हिमा ने उस टीचर की बात को मान लिया और रेसिंग में करियर बनाने की ठान ली. हिमा रेसिंग में वो सबकुछ हासिल करना चाहती थी. जो हर इंसान हासिल करना चाहता है. आज हिमा ने उसको हासिल करके दिखा दिया है.
करियर

कोच निपुण दास ने हिमा को फ़ुटबॉल से एथलेटिक्स में आने के लिए तैयार किया तो शुरुआत में 200 मीटर की तैयारी करवाई, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि वे 400 मीटर में अधिक कामयाब रहेंगी. हिमा ने आईएएएफ विश्व अंडर-20 चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा था. पूरे देश को एशियाई खेलों में भी उनसे स्वर्ण पदक की उम्मीद थी और वह इसकी दावेदार भी थीं. लेकिन सेमीफाइनल में उनके फाउल होने के कारण भारत के पदक जीतने की उम्मीदों को झटका लगा. और हिमा को इस प्रतिस्पर्धा में रजत पदक के साथ संतोष करना पड़ा.
हिमा दास ने 2019 में पोलैंड में आयोजित हो रही प्रतियोगिता में अब तक 6स्वर्ण पदक अपने नाम किए है. हिमा भारत की अकेली ऐसी महिला धावक है जिसने इतने सारे पदक जीते हों.
पुरस्कार

खेलों में बेहतरीन प्रर्दशन की वजह से हिमा दास को 25 सितंबर 2018 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया.

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