जब लोगों ने कहा मिक्की मियां का दिवाना तो आज़म खान ने उन्हें राजनीति से बाहर फेंक दिया

आज़म खान वो नाम जो हमेशा विवादो में घिरा रहता है। लोकसभा में रमा देवी पर अमर्यादित बयान देने से पहले आज़म खान एक शेर पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। शेर कुछ यूं था…

”तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूं लुटा
मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है”

ये शेर वैसे तो शायर शहाब जाफरी का है जिसे पढ़कर आज़म खान तीन तलाक़ बिल के विरेध में रहबरी पर सवाल उठा रहे थें पर शेर तो पूरा हो ना पाया बल्कि शेर आधा पढ़कर आज़म खान सांसद रमा देवी से उलझने लगे और कहते कहते ऐसी बातें कहने लगे जिसके लिए उन्हें माफी मांगनी पड़ गई। लेकिन इस शेर में जिस रहबरी की बात हो रही है उसे पढ़ते हुए आज़म खान ये भूल गए कि रामपुर के नवाबो की ओर से यही शेर उनपर भी नाज़िल हो सकता है।

जो शिकायत शुरू होती है आज़म खान की इस शेर में वो शिकायत रामपुर के नवाबों के खानदान की भी है। जहां के एक वारिस ने कांग्रेस के टिकट पर रामपुर की संसदीय सीट को संभाला था, जिसने आज़म को राजनीति में जमने में पूरी मदद की थी। इसलिए अब सवाल आता है आज़म की रहबरी पर।

रामपुर के नवाब ज़ुल्फीकार अली खान उर्फ मिक्की मियां नवाब के साथ साथ कांग्रेस से सांसद भी थे पर 70 के दशक में जब आज़म खान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी लॉ की पढ़ाई पूरी कर रामपुर लोटे तो वकालत छोड़ कर राजनीति में आने लगे औऱ साथ मिला जनता पार्टी(सेकुलर) का।

कहते हैं उस समय रामपुर में बीड़ी का कारेबार शबाब पर था और उससे जुड़ी समस्याएं बीड़ी मज़दूरों के साथ थी जिसके चलते आज़म खान ने बीड़ी मज़दूरों को साथ लेकर आंदेलन करना शुरू कर दिए जिसके चलते तमाम लोगों को लगने लगा की आज़म खान उनके साथ हैं।

साल 1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद जेल बाहर आए आज़म खान और भी आक्रामक हो गए थे वहीं इसी समय लोकसभा और विधान सभा चुनाव हुए जो आज़म खान के जीवन का पहला चुनाव था। आज़म खान जनता पार्टी सेकुलर से लड़ रहे थे पर आज़म खान पहली बार में चुनाव हार गए थे औऱ उधर मिक्की मियां भी चुनाव हार गए थे। कहते हैं इस चुनाव में आज़म का लक्ष्य मिक्की मियां को हरवाना था जिसके लिए उन्होनें भारतीय लोकदल के प्रत्याशी राजेंद्र कुमार शर्मा को समर्थन दे दिया था।

उधर विधान सभा में कांग्रेस के मंज़ूर अली खान उर्फ शन्नू खान के जीतने से पार्टी में कद बढ़ गया था और कांग्रेस के कार्यकर्ता सीधे तौर पर शन्नू खान से जुड़ने लगे। जिससे मिक्की मियां को अपने कद कम होने का डर सताने लगा की शायद पार्टी अगली बार सांसदी का टिकट शन्नू कुमार को दे सकती है। इसलिए उन्होंने आज़म खान को सपोर्ट करना शूरू कर दिया।

जिस नवाबी परिवार से आज आज़म खान खार खाते हैं, एक समय पहले आज़म खान को नवाब मिक्की मियां ने ही सपोर्ट किया था और उन्हें नाम दिया था दीवाना।

जिसके पीछे आज़म खान की राजनीति को लेकर दीवानगी वजह बताई जाती है।

और ऐसे लोगो ने कहना शुरू कर दिया मिक्की मियां का दीवाना।

खेर 1980 में हुए चुनावों में कहा गया की सांसद के लिए मिक्की मियां और विधायक के लिए दीवाने को वोट दो यानि आज़म खान को।

मिक्की मियां औऱ आज़म खान दोनो जीत गए। मिक्की मियां को शन्नू खान से होने वाला खतरा भी कम हो गया। पर उधर धीरे धीरे आज़म खान का कद बढ़ना शुरू हो गया। क्योंकि जहां देश में इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी का सफाया कर दिया था वहीं आज़म खान जनता पार्टी से चुनाव जीत गए थे।

इसके बाद आज़म खान खूब मशहूर हुए पर नाम के पीछे लगा दीवाना उन्हें चुभने लगा।

साल 1991 का चुनाव आया और आज़म खान अपनी सियासी फील्डिंग से मिक्की मियां  हार गए थे। फिर साल 1993 में आज़म खान की करीबी यादव परिवार से बढ़ गई और सामजवादी पार्टी  में शामिल हो गए। और उधर 1992 में मिक्की मियां की मौत हो गई जिसके बाद राजनीति में नवाबो का क़िला ढलना शरू हो गया।

वहीं बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आज़म खान को नई पहचान मिली जिसके बाद आज़म खान के बयानों का सिलसिला आजतक जारी है।

21वीं सदी आते आते आज़म खान को समाजवादी पार्टी की सरकार में आज़म खान को खुली छूट होती है और नतीजन आज़म खान एक एक कर रामपुर से नवाबो की हर निशानी को मिटाना शुरू कर दिया। चाहें वो इमारतें हों या सड़कें या नवाबो द्वारा बनाए गए गेट आज़म खान ने सब बदल डाला।

 

 

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