मर कर भी हमारे बीच अपनी कविताओं के जरिए जिंदा है, कवि रामधारी सिंह दिनकर

“अच्छे लगते मार्क्स, किंतु है अधिक प्रेम गांधी से.
प्रिय है शीतल पवन, प्रेरणा लेता हूं आंधी से.”
आज रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि है
रामधारी सिंह दिनकर की ये ऐसी लाइनें है जिन्हें पढ़कर एक अलग ही अहसास होता है. रामधारी सिंह दिनकर आजादी से पहले विद्रोह कवि और आजादी के बाद राष्ट्रकवि बने थें. दिनकर की कविताओं में विद्रोह, आक्रोश, क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी और दिनकर की कविताओं में श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति है. दिनकर पहले ऐसे कवि थे जिनको प्रगतिवादी और मानवादी के रूप में जाना जाता है.
दिनकर एक ऐसे कवि थे जिनका हर कोई दिवाना था. दिनकर ने सभी उम्र के लोगों पर अपनी कविताओं के माध्यम से छाप छोड़ी. रामधारी दिनकर की कविताओं को बड़े-बड़े विद्यान पढ़ते थे. दिनकर ने अपनी कविताओं में आजादी से पहले और बाद में सभी पहलूओं को एक सुर में पिरोया
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया गांव में 23 सितंबर 1908 को हुआ. दिनकर जब दो साल के थे तो तभी दिनकर के पिता देहांत हो गया. दिनकर और इसके भाई बहनों का पालन पोषण इनकी माता ने किया. दिनकर को बांग्ला, अंग्रेजी, संस्कृत औऱ हिन्दी का अच्छा ज्ञान था. दिनकर ने भागलपुर विश्वविद्यालय में उपकुलपति के पद पर काम किया. उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने.
भूषण के बाद रामधारी सिंह दिनकर को वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है.
ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है. 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया.
रामधारी सिंह दिनकर का निधन24 अप्रैल 1974 को हुआ. दिनकर एक जनकवि के साथ राष्ट्रकवि भी थे. देश की आजादी की लड़ाई से लेकर आजादी मिलने तक के सफर को दिनकर ने अपनी कविताओं द्वारा व्यक्त किया है. यहीं नहीं देश की हार जीत और हर कठिन परिस्थिति को दिनकर ने अपनी कविताओं में उतारा है.

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