एक आम बागान वाले से CCD के मालिक बनने तक का सफर

 

अ ल़ॉट कैन हैपन ओवर कॉफी

इस टेग लाइन के साथ कई शहरों में और कई जगह पर पर मौजूद CCD यानि “कैफे कॉफी डे” में आपने कई बार कॉफी का आनंद ज़रूर उठाया होगा।

लेकिन इस चेन की शुरुआत कहां से और कैसे होती है हम आपको बताते हैं।

कहानी शुरू होती है कर्नाटक से। एक परिवार में बटवारे के बाद एक व्यक्ति के हाथो 90 हज़ार रुपये मिलते हैं पर साल था 1956 जब 90 हज़ार रुपये बढ़ी रक़म हुआ करती थी। उस आदमी ने परिवार से दूर चिंमंगलूर में उन पैसों से एक 479 एकड़ का कॉफी प्लांटेशन खरीदा। इसी साल उसका बेटा पैदा हुआ जिसका नाम रखा वी जी सिद्धार्थ।

सिद्धार्थ वैसे तो कॉफी के बागान संभालता था पर उसका दिमाग स्टॉक एक्सचेंज में लगा। और वो कॉफी का बागान नहीं संभालना चाहता था। एक फाइनैंशल मैगज़ीन में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के पूर्व प्रेज़िडेंट महेंद्र कंपानी की प्रोफाइल पढ़ वो मुंबई चल दिया औऱ फिल्मी अंदाज़ में सीधा दफ्तर में घुस कर कंपानी से जाकर कह दिया कि आपके साथ काम करना है। और कंपानी नें रख भी लिया और दो साल तक सिद्धार्थ नें वहां काम किया। फिर बंगलुरु आकर सिद्धार्थ नें मुनाफे के पैसों से कॉफी के बागान खरीदने शुरू करे।

फिर साल 1992 में  सिद्धार्थ ने स्टॉक मार्केट से  अपना सारा निवेश बेच दिया।

उधर 1991 में कॉफी के क्षेत्र में लिबरलाइज़ेशन शुरू हो चुका था जिससे कॉफी उत्पादकों की मोज शुरू हो गई थी। उधर सिद्धार्थ ने भी अपने सारे मुनाफे को कॉफी के कारोबार में डाल रखा था। और देखते ही देखते सिद्धार्थ कॉफी के सबसे बड़े एक्सपोर्टर बन गए।। साल 1993 में सिद्धार्थ नें कॉफी ग्लोबल लिमिटेड के नाम से कैफे बिज़नस की शुरुआत की और कॉफी डे के ब्रांड नेम से दुकानों में कॉफी बीन्स औऱ कॉफी पाउडर की सप्लाई शुरू की।

 

साल 1996 में सिद्धार्थ नें ‘कैफे कॉफी डे’ लॉन्च किया जिसे बेंगलुरु के ब्रिगेड रोड पर खोला गया। जिसका आइडिया उन्हें सिंगापुर के एक रेस्तरां से मिला था जहां कई लोग बिअर पीते हुए इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे। और सिद्धार्थ नें भारत में बिअर की जगह कॉफी को दे दी। 25 रुपये की कॉफी से वहां पर कई स्कूल और कॉलेज के दोस्त जिनके पास मिलने की जगह नही होती थी वो साथ बैठकर टाइम स्पेंड कर सकते थे। औऱ ऊपर से कंप्यूटर औऱ इंटरनेट का मज़ा और गाड़ी निकल पड़ी। देखते ही देखते CCD स्टाइल और अपील के दम पर फैलने लगा।

29 जुलाई 2019 को सिद्धार्थ के लापता होने की खबर आई और एख चिट्ठी जिसमें लिखा था।

उन सब ने जिन्होंने मुझपर भरोसा किया, मैं उन सबसे बहुत बहुत मुआफ़ी मांगता हूं. मैंने उन्हें निराश किया है. एक व्यवसायी के तौर पर मैं नाकाम हो गया हूं. मैंने बहुत लंबे समय तक संघर्ष किया, मगर आज मैं हिम्मत हार गया हूं. एक निजी इक्विटी पार्टनर मुझपर शेयर वापस खरीदने का दबाव डाल रहा है.

वो लेनदेन छह महीने पहले हो चुका है. उसके लिए मैंने एक दोस्त से बहुत सारे रुपये उधार लिए थे. मैं अब और नहीं झेल सकता ये प्रेशर. बाकी लेनदारों की तरफ से मिल रहे हद से ज्यादा दबाव के कारण मैं अब सरेंडर कर रहा हूं. मैंने बहुत कोशिश की, मगर एक मुनाफ़ा कमाने वाले बिज़नस का मॉडल नहीं बना पाया. मैं कभी किसी को धोखा नहीं देना चाहता था.

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